ध्यानी के जीवन में प्रार्थना और जप का स्थान | Rachna Sharma
भगवान् में विश्वास रखने वालों के लिए मन की एकाग्रता और भगवद्भाव की प्राप्ति, ये दोनों बड़ी सहायता करते हैं। मेरे विचार से हमें भगवान के साथ एक रिश्ता जरूर बनाना चाहिए। प्रार्थना सदा परम्परागत रूप में या औपचारिक ही हो ऐसा जरुरी नहीं है। परमात्मा के साथ एक परम विश्वस्त मित्र को तरह या किसी भी रिश्ते में बांधकर हमे अपना हृदय खोल कर स्पष्ट और सीधी बातचीत करनी चाहिए। भगवान् के साथ हमेशा बातें करते रहना चाहिए वो भी बिना संकोच और बाधा के। भगवान् के प्रति की गई प्रार्थना सीधे हमारे हृदय से निकलनी चाहिए।
कुछ महात्मा अपने शिष्यों से सदा-सर्वदा प्रार्थना करने को कहते है। वे खुद भी हमेशा हर घडी प्रार्थना करते रहते है और उसी भाव में रहते है। मैं इसे गलत नहीं मानती लेकिन प्रार्थना को लेकर मेरा अपना विचार है जितना मुझे मेरे गुरु जी श्री स्वामी रामदेवानंद सरस्वती जी ने सिखाया है प्रार्थना करने वाले प्राय: यह बात भूल जाते हैं कि कोई भी आध्यात्मप्रवण व्यक्ति प्रार्थना को केवल किसी निश्चित समय और proper material के साथ किया जाने वाला कार्य समझता है जबकि एक ध्यानी का हर कार्य चलना-फिरना, उठना-बैठना, खाना-पीना, खेलना-कूदना आदि किसी ना किसी रूप में प्रार्थना स्वरूप ही होते हैं।साधना करने वाला व्यक्ति जप और प्रार्थना में डिफरेंस बहुत भली भांति जानते है क्यूंकि ध्यान करने वाले व्यक्ति के जीवन में जप और प्रार्थना, दोनों का ही बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। मेरे विचार से जप करना एक उपयुक्त साधना-पद्धति है तथापि जैसा कि पातञ्लल योग सूत्र १.३६ में लिखा है कि महर्षि पतञ्जञलि कहते हैं कि कुछ लोग जप की सहायता के बिना भी परमात्मा का ध्यान कर सकते हैं और वो सभी सफल भी हुए ह।
उपांशु जप: ऐसे साधक ध्यान की प्रारंभिक तैयारी के बाद हल्के से उच्चारण के साथ जप कर सकते हैं।
नि:शब्द मानसिक जप: उपांशु जप के लगातार अभ्यास के बाद में यही परिपक्व होकर नि:शब्द मानसिक जप में परिणत हो जाता है।
एकाग्रचित और शांत मन चाहते हो तो निरंतर जप करते रहिये निश्चित मानिये अन्तत: भगवान् के सानिध्य का अनुभव होने लगता है।