Monday, January 6, 2025

एक ध्यानी के जीवन में प्रार्थागा और जप का क्या स्थान है?

 ध्यानी के जीवन में प्रार्थना और जप का स्थान | Rachna Sharma 

भगवान्‌ में विश्वास रखने वालों के लिए मन की एकाग्रता और भगवद्भाव की प्राप्ति, ये दोनों बड़ी सहायता करते हैं। मेरे विचार से हमें भगवान के साथ एक रिश्ता जरूर बनाना चाहिए। प्रार्थना सदा परम्परागत रूप में या औपचारिक ही हो ऐसा जरुरी नहीं है। परमात्मा के साथ एक परम विश्वस्त मित्र को तरह या किसी भी रिश्ते में बांधकर हमे अपना  हृदय खोल कर स्पष्ट और सीधी बातचीत करनी चाहिए। भगवान्‌ के साथ हमेशा बातें करते रहना चाहिए वो भी बिना संकोच और बाधा के। भगवान्‌ के प्रति की गई प्रार्थना सीधे हमारे हृदय से निकलनी चाहिए।

कुछ महात्मा अपने शिष्यों से सदा-सर्वदा प्रार्थना करने को कहते है। वे खुद भी हमेशा हर घडी प्रार्थना करते रहते है और उसी भाव में रहते है। मैं इसे गलत नहीं मानती लेकिन प्रार्थना को लेकर मेरा अपना विचार है जितना मुझे मेरे गुरु जी श्री स्वामी रामदेवानंद सरस्वती जी ने सिखाया है प्रार्थना करने वाले प्राय: यह बात भूल जाते हैं कि कोई भी आध्यात्मप्रवण व्यक्ति प्रार्थना को केवल किसी निश्चित समय और proper material के साथ किया जाने वाला कार्य समझता है जबकि एक ध्यानी का हर कार्य चलना-फिरना, उठना-बैठना, खाना-पीना, खेलना-कूदना आदि किसी ना किसी रूप में प्रार्थना स्वरूप ही होते हैं।

साधना करने वाला व्यक्ति जप और प्रार्थना में डिफरेंस बहुत भली भांति जानते है क्यूंकि ध्यान करने वाले व्यक्ति के जीवन में जप और प्रार्थना, दोनों का ही बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। मेरे विचार से जप करना एक उपयुक्त साधना-पद्धति है तथापि जैसा कि पातञ्लल योग सूत्र १.३६ में लिखा है कि महर्षि पतञ्जञलि कहते हैं कि कुछ लोग जप की सहायता के बिना भी परमात्मा का ध्यान कर सकते हैं और वो सभी सफल भी हुए ह। 

उपांशु जप: ऐसे साधक ध्यान की प्रारंभिक तैयारी के बाद हल्के से उच्चारण के साथ जप कर सकते हैं।

नि:शब्द मानसिक जप:  उपांशु जप के लगातार अभ्यास के बाद में यही परिपक्व होकर नि:शब्द मानसिक जप में परिणत हो जाता है। 

एकाग्रचित और शांत मन चाहते हो तो निरंतर जप करते रहिये निश्चित मानिये अन्तत: भगवान्‌ के सानिध्य का अनुभव होने लगता है। 

Rachna Sharma | Influencer 

Saturday, December 17, 2022

धोबी न घर का रहा न घाट का.।।

सती अनुसूया 

 

प्रकृति अभावमयी है, परमात्मा भावरूप हैं। अतः जो जागतिक भावों की पूर्ति न चाहकर परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, वे सदा भावयुक्त होते चले जाते हैं और सहज ही अभावों की ज्वाला से छुटकारा पाते रहते हैं।

माता अनसूया कहती हैं- क्षणभर के सुख के लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्ट कौन होगी ? जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत्य-धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है-

बिनु श्रम नारि परम गति लहई।

पतिब्रत धर्म छाडि छल गहई।।

ऋषि-पत्नीकी सीख है- जो पति के प्रतिकूल जाती है, वह जहाँ भी जन्म लेती है, वहीं युवा होकर विधवा हो जाती है-

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई।

बिधवा होइ पाइ तरुनाई।।

अनसूयाजी पुनः कहती हैं- ‘स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किंतु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है।' ‘पातिव्रत्यधर्म’ के कारण ही वृन्दा- तुलसीजी आज भी श्रीहरि की प्यारी है अर्थात् भगवान् को प्रिय है और चारों वेद उनका यशोगान करते हैं।

ऋषि-पत्नी के अनुवर्ती वचन विश्व की नारियों के लिये अप्रतिम संदेश है-

सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।

तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।

हे सीते ! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पातिव्रत्यधर्म का पालन करेंगी, तुम्हें तो श्रीराम जी प्राणों की तरह प्रिय हैं, यह (पातिव्रत्यधर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिये कही है।

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                                                                  माता का निंदक धोबी

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जब भगवान श्रीराम अपने धाम को चले उस समय उनके साथ अयोध्या के सभी पशु- पक्षी, पेड़-पौधे मनुष्य भी उनके साथ चल पड़े. उनमें सीता जी की निंदा करने वाला धोबी भी था.

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भगवान ने उस धोबी का हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और उनको अपने साथ लिए चल रहे थे. जिस-जिस ने भगवान को जाते देखा वे सब भगवान के साथ चल पड़े. कहते है कि वहां के पर्वत भी उनके साथ चल पड़े.

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सभी पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, पर्वत और मनुष्यों ने जब साकेत धाम में प्रवेश करना चाहा तब साकेत का द्वार खुल गया पर जैसे ही उस निंदनीय धोबी ने प्रवेश करना चाहा तो द्वार बंद हो गया.

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साकेत द्वार ने भगवान से कहा- महाराज ! आप भले ही इसका हाथ पकड़ लें पर यह जगत जननी माता सीता जी की निंदा कर चुका है. इसका पाप इतना बड़ा है कि मैं इसे साकेत में प्रवेश की अनुमति नहीं दे सकता.

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जिस समय भगवान सब को साथ लिए साकेत की ओर चले जा रहे थे उसी समय सभी देवी-देवता भी आकाश मार्ग से देख रहे थे कि आखिर सीता माता की निंदा करने वाले पापी धोबी को भगवान कहां स्थान दिलाते हैं.

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भगवान ने द्वार बन्द होते ही इधर-उधर देखा तो ब्रह्मा जी ने सोचा कि कहीं भगवान इस पापी को मेरे ब्रह्मलोक में ही न भेज दें. ब्रह्मा जी चिंतित हो गए. हाथ हिला-हिलाकर कहने लगे- प्रभु ! इस पापी के लिए मेरे ब्रह्मलोक में कोई स्थान नही है.

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इन्द्र ने सोचा कि प्रभु कहीं इसे मेरे इन्द्र लोक में न भेज दे. इससे इंद्र भी घबराए. उन्होंने भी प्रभु को विनती लगाई- प्रभु ! इस पापी के लिए इन्द्र लोक में भी कोई जगह नही है. आप ऐसा आदेश करके मुझे धर्मसंकट में न डालिएगा.

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अब ध्रुव जी को चिंता हुई कि कहीं आखिर में प्रभु इस पापी को ध्रुव लोक में ही स्थान न दे दें. इसका पाप इतना बड़ा है की इसके पाप के बोझ से ध्रुव लोक गिरकर नीचे आ जायेगा. यह लोक भी प्रभु ने ही दिया है इसलिए इसकी रक्षा वही करेंगे.

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ऐसा विचार कर ध्रुव जी भी कहने लगे- प्रभु आपने ही ध्रुव लोक प्रदान किया है. आप इस पापी को मेरे पास भी मत भेजिएगा. अन्यथा आपके द्वारा प्रदत्त मेरा ध्रुव लोक इस पापी के कारण संकट में आ जाएगा. रक्षा करिएगा प्रभु.

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दस लोकों के दसों दिकपालों को भी चिंता थी. जिनका अपना अलग से लोक बना था उन सभी देवताओं ने विनय पूर्वक प्रभु से गुहार लगाई और उस निकृष्ट पापी धोबी को अपने लोक मे रखने से क्षमा याचना के साथ मना कर दिया.

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भगवान खड़े-खड़े मुस्कुराते हुए सबका चेहरा देख रहे हैं पर कुछ बोलते नहीं. देवताओं की भीड़ में यमराज भी खड़े थे. यमराज ने सोचा कि ये किसी लोक में जाने का अधिकारी नहीं है.

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अब इस पापी को भगवान कहीं मेरे यहां न भेज दें. माता की निंदा करने वाले को किसी देवता ने स्थान नहीं दिया. यदि मेरे लोक में स्थान मिल गया तो देवताओं के बीच निंदा का कारण भी बन सकता हूं. इसे यम पुरी में नहीं रखा जा सकता.

.यमराज जी घबराकर उतावली वाणी से बोले- महाराज ! स्वामी ! आपने जिसका हाथ थाम रखा है वह इतना बड़ा पापी है कि इसके लिए मेरी यम पुरी में भी कोई जगह नहीं है!अब धोबी को घबराहट होने लगी कि मेरी दुर्बुद्धी ने इतना निंदनीय कर्म करवा दिया कि यमराज भी मुझे नहीं रख सकते. अब तो मेरा जाने क्या हो! भगवान ने धोबी की घबराहट देखकर संकेत से कहा- तुम घबराओ मत ! मैं अभी तुम्हारे लिए एक नए साकेत का निर्माण करता हूं. तब भगवान ने उस धोबी के लिए एक अलग साकेत धाम बनाया.

सिय निँदक अघ ओघ नसाए,

लोक बिसोक बनाइ बसाए।

ऐसा अनुभव होता है कि आज भी वह धोबी अकेला ही उस साकेत में पड़ा है जहां कोई देवी-देवता का वास नहीं है. न हीं तो वह किसी को देख सकता है और न ही उसको कोई देख सकता है. इस तरह धोबी न घर का रहा न घाट का. (रामायण की क्षेपक कथा)


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Thursday, February 17, 2022

कुण्डलिनी जागरण का संपूर्ण शारीरिक विज्ञानं By Rachna Sharma

मुझे ये जानकर बेहद ख़ुशी है की आज इस कलयुग में भी लोग चक्र जागरण के विधि जानने में काफी उत्सुक है वैसे हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियां होती हैं ये हमारे शरीर के ऊर्जा‌-कोष में विद्यमान रहती है, जिसे प्राणमयकोष कहा जाता है! ये 72,000 नाड़ियां तीन मुख्य नाड़ियों- बाईं, दाहिनी और मध्य यानी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से होकर गुजरती हैं। अब आप अगर ये सोच रहे है की ‘नाड़ी’ का मतलब यानि धमनी या नस, तो आप गलत है। नाड़ी होती तो है पर दिखाई नहीं देती लेकिन प्रभाव का जोरदार असर होता है! नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। इन 72,000 नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें देख नहीं पाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह पहले से तय रास्तों से गुजर रही है और ये लगातार हो रहा है । प्राण या ऊर्जा 72,000 अलग-अलग रास्तों से या नाड़ियों से होकर गुजरती है।

इड़ा और पिंगला, ये क्या है? अगर आप रीढ़ की शारीरिक बनावट के बारे में जानने की कोशिश करें, तो देखेंगे कि रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ दो छोटे छिद्र होते हैं, जो वाहक नली की तरह होते हैं, जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। ये इड़ा और पिंगला, यानी बायीं और दाहिनी नाड़ियां हैं। इड़ा और पिंगला जीवन की बुनियादी द्वैतता की प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित भी कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू – लॉजिक या तर्क-बुद्धि और इंट्यूशन या सहज-ज्ञान हो सकते हैं। जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा वह अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है।

पुरुषत्व और स्त्रीतत्व का मतलब लिंग भेद से - या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से - नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है, तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं।अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बनाने की भी एक विधि है जिसके बारे में हम आगे बतायेंगे! ज्यादातर  लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय- निर्जीव बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जीवन असल में तभी शुरू होता है। जो आनंद से भरा होता है !

मूल रूप से सुषुम्ना में कोई ख़ास गुण नहीं होता मतलब सीधा है सुषुम्ना गुणहीन होती है, उसकी अपनी कोई विशेषता नहीं होती। वह एक तरह की शून्‍यता या खाली स्थान है। शून्यता होना ही इसका गुण है क्यूंकि अगर शून्‍यता है तो उससे आप अपनी मर्जी से कोई भी चीज बना सकते हैं। आज हम सभी ध्यान शून्यता को पाने के लिए ही करते है! सुषुम्ना में जैसे ही ऊर्जा का प्रवेश होता है, आपमें वैराग्‍य आ जाता है। ‘राग’ का अर्थ होता है, रंग। ‘वैराग्य’ का अर्थ है, रंगहीन यानी आप पारदर्शी हो गए हैं। अगर आप पारदर्शी हो गए, तो आपके पीछे पीला रंग होने पर आप भी पीले हो जाएंगे। अगर आपके पीछे भगवा रंग होगा, तो आप भी भगवा हो जाएंगे। आप निष्पक्ष हो जाते हैं। आप जहां भी रहें, आप वहीं का एक हिस्सा बन जाते हैं लेकिन कोई चीज आपसे चिपकती नहीं। आप जीवन के सभी पहलु को खोजने का साहस सिर्फ तभी करते हैं, जब आप आप वैराग की स्थिति में होते हैं।


अभी आप चाहे काफी खुश और संतुलित हों, लेकिन अगर किसी वजह से बाहर का वातावरण शांतिपूर्ण नहीं है, तो उसकी प्रतिक्रिया में आप भी अशांत हो जाएंगे क्योंकि इड़ा और पिंगला का स्वभाव ही ऐसा ही होता है। अगर आप इड़ा या पिंगला से प्रभावित होते हैं तो आप बाहरी स्थितियों को देखकर वैसी ही प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन एक बार सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश हो जाए, तो आप एक नए किस्म का संतुलन का अनुभव करते हैं, एक अंदरूनी संतुलन, जिसमें बाहर चाहे जो भी हो, आपके अंदर एक खास जगह होती है, जो किसी भी तरह की हलचल में कभी अशांत नहीं होती, जिस पर बाहरी स्थितियों का असर नहीं पड़ता। आप चेतनता की चोटी पर सिर्फ तभी पहुंच सकते हैं, जब आप अपने अंदर यह स्थिर अवस्था बना लें।

By Rachna Sharma 

एक ध्यानी के जीवन में प्रार्थागा और जप का क्या स्थान है?

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