मुझे ये जानकर बेहद ख़ुशी है की आज इस कलयुग में भी लोग चक्र जागरण के विधि जानने में काफी उत्सुक है वैसे हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियां होती हैं ये हमारे शरीर के ऊर्जा-कोष में विद्यमान रहती है, जिसे प्राणमयकोष कहा जाता है! ये 72,000 नाड़ियां तीन मुख्य नाड़ियों- बाईं, दाहिनी और मध्य यानी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से होकर गुजरती हैं। अब आप अगर ये सोच रहे है की ‘नाड़ी’ का मतलब यानि धमनी या नस, तो आप गलत है। नाड़ी होती तो है पर दिखाई नहीं देती लेकिन प्रभाव का जोरदार असर होता है! नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। इन 72,000 नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें देख नहीं पाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह पहले से तय रास्तों से गुजर रही है और ये लगातार हो रहा है । प्राण या ऊर्जा 72,000 अलग-अलग रास्तों से या नाड़ियों से होकर गुजरती है।
इड़ा और पिंगला, ये क्या है? अगर आप रीढ़ की शारीरिक बनावट के बारे में जानने की कोशिश करें, तो देखेंगे कि रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ दो छोटे छिद्र होते हैं, जो वाहक नली की तरह होते हैं, जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। ये इड़ा और पिंगला, यानी बायीं और दाहिनी नाड़ियां हैं। इड़ा और पिंगला जीवन की बुनियादी द्वैतता की प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित भी कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू – लॉजिक या तर्क-बुद्धि और इंट्यूशन या सहज-ज्ञान हो सकते हैं। जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा वह अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है।
पुरुषत्व और स्त्रीतत्व का मतलब लिंग भेद से - या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से - नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है, तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं।अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बनाने की भी एक विधि है जिसके बारे में हम आगे बतायेंगे! ज्यादातर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय- निर्जीव बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जीवन असल में तभी शुरू होता है। जो आनंद से भरा होता है !
मूल रूप से सुषुम्ना में कोई ख़ास गुण नहीं होता मतलब सीधा है सुषुम्ना गुणहीन होती है, उसकी अपनी कोई विशेषता नहीं होती। वह एक तरह की शून्यता या खाली स्थान है। शून्यता होना ही इसका गुण है क्यूंकि अगर शून्यता है तो उससे आप अपनी मर्जी से कोई भी चीज बना सकते हैं। आज हम सभी ध्यान शून्यता को पाने के लिए ही करते है! सुषुम्ना में जैसे ही ऊर्जा का प्रवेश होता है, आपमें वैराग्य आ जाता है। ‘राग’ का अर्थ होता है, रंग। ‘वैराग्य’ का अर्थ है, रंगहीन यानी आप पारदर्शी हो गए हैं। अगर आप पारदर्शी हो गए, तो आपके पीछे पीला रंग होने पर आप भी पीले हो जाएंगे। अगर आपके पीछे भगवा रंग होगा, तो आप भी भगवा हो जाएंगे। आप निष्पक्ष हो जाते हैं। आप जहां भी रहें, आप वहीं का एक हिस्सा बन जाते हैं लेकिन कोई चीज आपसे चिपकती नहीं। आप जीवन के सभी पहलु को खोजने का साहस सिर्फ तभी करते हैं, जब आप आप वैराग की स्थिति में होते हैं।
अभी आप चाहे काफी खुश और संतुलित हों, लेकिन अगर किसी वजह से बाहर का वातावरण शांतिपूर्ण नहीं है, तो उसकी प्रतिक्रिया में आप भी अशांत हो जाएंगे क्योंकि इड़ा और पिंगला का स्वभाव ही ऐसा ही होता है। अगर आप इड़ा या पिंगला से प्रभावित होते हैं तो आप बाहरी स्थितियों को देखकर वैसी ही प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन एक बार सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश हो जाए, तो आप एक नए किस्म का संतुलन का अनुभव करते हैं, एक अंदरूनी संतुलन, जिसमें बाहर चाहे जो भी हो, आपके अंदर एक खास जगह होती है, जो किसी भी तरह की हलचल में कभी अशांत नहीं होती, जिस पर बाहरी स्थितियों का असर नहीं पड़ता। आप चेतनता की चोटी पर सिर्फ तभी पहुंच सकते हैं, जब आप अपने अंदर यह स्थिर अवस्था बना लें।